चंद्रपुर: पुलिस हिरासत में बंद 57 वर्षीय आरोपी जितेंद्र मिद्दूलाल सरसर को कथित रूप से गलत एवं विवादित मेडिकल प्रमाणपत्र जारी किए जाने का मामला सामने आया है। मामले में संबंधित चिकित्सकों एवं अधिकारियों की भूमिका की जांच कर उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की मांग की गई है।
जानकारी के अनुसार, पुलिस स्टेशन रामनगर, चंद्रपुर में दर्ज ए.पी. क्रमांक 1030/2026 के तहत आईपीसी की धारा 318(4), 319(2), 351(2) एवं 3(5) के अंतर्गत जितेंद्र मिद्दूलाल सरसर को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस हिरासत के दौरान आरोपी ने 23 अगस्त 2026 को सीने में दर्द की शिकायत करते हुए चंद्रपुर के जनरल अस्पताल में उपचार के लिए स्वयं को प्रस्तुत किया।
शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी के दस्तावेजों की उचित जांच एवं कथित रूप से पर्याप्त शारीरिक परीक्षण किए बिना उसके मौखिक बयान के आधार पर उसे चिकित्सकीय रूप से अयोग्य बताए जाने वाला प्रमाणपत्र जारी किया गया। उक्त प्रमाणपत्र में आरोपी को मधुमेह, उच्च रक्तचाप एवं अस्थमा से पीड़ित बताते हुए सीने में दर्द के कारण आईसीयू में भर्ती किए जाने का उल्लेख किया गया था।
बताया गया है कि पुलिस अधिकारी, पुलिस स्टेशन रामनगर, चंद्रपुर के नाम से जारी इस प्रमाणपत्र पर कोई इनवर्ड-आउटवर्ड क्रमांक नहीं था। प्रमाणपत्र पर प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, चिकित्सा विभाग, जीएमसीएच चंद्रपुर की मुहर भी लगी होने का दावा किया गया है। बाद में यही प्रमाणपत्र पुलिस द्वारा न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया गया, जिसके आधार पर आरोपी की चिकित्सकीय स्थिति को लेकर निष्कर्ष निकाला गया।
मामले को लेकर जब संबंधित पक्ष द्वारा डीन कार्यालय में जानकारी मांगी गई, तो कथित तौर पर डॉ. श्वेता को कार्यालय में बुलाया गया। शिकायत के मुताबिक, इस दौरान डॉ. श्वेता ने कथित रूप से स्वीकार किया कि प्रमाणपत्र उनके द्वारा लिखा नहीं गया था और उन्होंने उस पर मुहर भी नहीं लगाई थी, हालांकि उस पर उनके हस्ताक्षर होने की बात कही गई।
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल उस समय खड़े हुए जब बाद में न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए एक अन्य मेडिकल प्रमाणपत्र में आरोपी की चिकित्सकीय स्थिति को लेकर अलग-अलग जानकारी सामने आने का दावा किया गया। शिकायतकर्ता के अनुसार, दूसरे प्रमाणपत्र में आरोपी को मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अस्थमा नहीं होने का उल्लेख किया गया था। साथ ही, दोनों प्रमाणपत्रों में आरोपी के अस्पताल में भर्ती होने की तारीख को लेकर भी अंतर होने का आरोप लगाया गया है।
बताया गया है कि बाद वाला प्रमाणपत्र चिकित्सा विभाग की टीम संख्या 1 से जुड़े सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर तथा प्रोफेसर एवं टीम प्रमुख द्वारा हस्ताक्षरित था। दोनों प्रमाणपत्रों में दर्ज जानकारी में कथित विरोधाभास के चलते पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग जोर पकड़ रही है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि एक ओर आरोपी को गंभीर बीमारियों से ग्रस्त बताते हुए आईसीयू में भर्ती किए जाने का प्रमाणपत्र दिया गया, जबकि दूसरे प्रमाणपत्र में उन्हीं बीमारियों के मौजूद नहीं होने की जानकारी सामने आई। इससे अस्पताल की मेडिकल रिकॉर्ड व्यवस्था एवं संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, अदालत में हुई चर्चा के दौरान डीन ने संबंधित डॉक्टरों एवं अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने तथा न्यायालय में नया प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का आश्वासन दिया था। हालांकि, 27 अगस्त 2026 को जब संबंधित अधिकारियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी लेने के लिए डीन कार्यालय में संपर्क किया गया, तो कथित तौर पर संतोषजनक जानकारी देने के बजाय शिकायतकर्ताओं को कार्यालय से बाहर जाने के लिए कहा गया।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि 29 अगस्त 2026 तक फर्जी या गलत प्रमाणपत्र जारी करने के लिए जिम्मेदार किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई थी। इसी कारण मामले में वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच किए जाने की मांग की जा रही है।
शिकायतकर्ता ने प्रमाणपत्र जारी करने की पूरी प्रक्रिया, अस्पताल के मेडिकल रिकॉर्ड, संबंधित डॉक्टरों के हस्ताक्षर एवं मुहर तथा आरोपी के उपचार से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। साथ ही, यदि जांच में किसी अधिकारी या चिकित्सक की लापरवाही अथवा जानबूझकर गलत प्रमाणपत्र जारी करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित व्यक्तियों को तत्काल निलंबित कर उनके खिलाफ कड़ी कानूनी एवं विभागीय कार्रवाई किए जाने की मांग की गई है।
पत्रकारों से मामले को प्रमुखता से उठाने की अपील
शिकायतकर्ताओं ने सभी पत्रकारों एवं समाचार माध्यमों से मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी निष्पक्ष जांच की मांग को प्रमुखता से उठाने का अनुरोध किया है। उनका कहना है कि यदि किसी आरोपी को पुलिस हिरासत से राहत या न्यायालयीन प्रक्रिया को प्रभावित करने के उद्देश्य से गलत मेडिकल प्रमाणपत्र जारी किया गया है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है और इसकी उच्चस्तरीय जांच आवश्यक है।
हालांकि, लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है। संबंधित चिकित्सकों एवं अस्पताल प्रशासन का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।





