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नाबालिग से यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को 20 साल का कठोर कारावास

चंद्रपुर: नाबालिग बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में चंद्रपुर जिला एवं सत्र न्यायालय ने आरोपी को पॉक्सो अधिनियम के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है। न्यायालय ने आरोपी पर ₹5,000 का जुर्माना भी लगाया है।

पुलिस के अनुसार, 27 अगस्त 2022 को सुबह करीब 10:15 से 11 बजे के बीच ब्रह्मपुरी तालुका के बांद्रा स्थित गुरुकुंज आश्रम मंदिर परिसर में 5 वर्षीय बच्ची खेल रही थी। इसी दौरान आरोपी युवराज बलिराम मेश्राम (30) ने बच्ची के साथ जबरन यौन उत्पीड़न किया। बच्ची के चिल्लाने पर घटना की जानकारी आसपास के लोगों को हुई और आरोपी मौके से फरार हो गया।

घटना की शिकायत मिलने के बाद ब्रह्मपुरी पुलिस थाने में अपराध क्रमांक 437/2022 के तहत भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं तथा पॉक्सो अधिनियम, 2012 की धाराओं 6 और 10 के तहत मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर मामले की जांच शुरू की।

जांच के दौरान पुलिस ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, चिकित्सकीय रिपोर्ट और अन्य परिस्थितिजन्य साक्ष्य एकत्र किए। जांच पूरी होने के बाद न्यायालय में समय पर आरोप पत्र दाखिल किया गया।

न्यायालय ने सुनाई सजा

मामले की सुनवाई चंद्रपुर जिला एवं सत्र न्यायालय में माननीय न्यायाधीश पी.एम. गुप्ता के समक्ष हुई। सरकारी पक्ष की ओर से सरकारी अभियोजक अधिवक्ता सुधाकर देगावार ने न्यायालय के समक्ष साक्ष्य और दलीलें प्रस्तुत कीं। न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए 21 अगस्त 2024 को आरोपी युवराज मेश्राम को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई।

इसके साथ ही आरोपी पर ₹5,000 का जुर्माना लगाया गया। जुर्माना अदा नहीं करने पर उसे एक माह का साधारण कारावास भुगतना होगा। न्यायालय ने जुर्माने की पूरी ₹5,000 राशि पीड़ित बच्ची को मुआवजे के रूप में देने का आदेश भी दिया।

पुलिस टीम की भूमिका

मामले की जांच महिला पुलिस उपनिरीक्षक स्वाति फुलेकर, ब्रह्मपुरी पुलिस थाने ने की। न्यायालय में मामले की पैरवी पुलिस अंमलदार प्रकाश नागराव शेंद्रे (बी.एन. 227), पोस्ट ब्रह्मपुरी ने की।

पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई चंद्रपुर के पुलिस अधीक्षक आयुष नोपानी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ईश्वर कटकाडे तथा ब्रह्मपुरी के उपविभागीय पुलिस अधिकारी के मार्गदर्शन में पूरी की गई। मामले में दोषसिद्धि सुनिश्चित करने में जांच अधिकारी, अभियोजन पक्ष और न्यायालयीन पैरवी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।